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Reading: जरूरी मुद्दे को बहादुरी से दिखाने की कामयाब कोशिश
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Entertainment

जरूरी मुद्दे को बहादुरी से दिखाने की कामयाब कोशिश

कई अनूठे और दबे छुपे मुद्दों पर फिल्में बनी है।

Last updated: सितम्बर 13, 2023 11:06 अपराह्न
By Parikshit 2 वर्ष पहले
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6 Min Read
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तर्क के जिस धागे में “ओ माय गॉड” पिरोही गई थी उसी को और मजबूत करने में कामयाब रही है ओएमजी – 2। श्री कृष्ण हो या महाकाल.. अंधी आस्था से नहीं बल्कि तर्क और सच्ची भावना से प्रसन्न होते हैं। ये बात साबित करने में फिल्म कामयाब रही है। कई अनूठे और दबे छुपे मुद्दों पर फिल्में बनी है, लेकिन omg 2 अपने आप में सबसे अलग है। सेक्स एजुकेशन के मामले के यह फिल्म माइलस्टोन साबित हो सकती है। साल दर साल… पीढ़ी दर पीढ़ी कठिन बना दिए गए मुद्दे को आसानी से समझाया और बहादुरी से बताया गया है। सेंसर बोर्ड को कैंची नहीं चलाना थी।अक्षय को शिव गण की जगह साक्षात शिव ही रहने देना था। अगर ऐसा होता तो omg २ में सोने पर सुहागा वाली कहावत सही हो जाती। जीतने प्रभावी और खूबसूरत वह श्री कृष्ण रूप में लग रहे थे उतने ही महाकाल बनकर लगे हैं। वन और टू में फर्क हम अहम फर्क यही है की पहली वाली में कांजीलाल नास्तिक था और दूसरी वाली का कांतिलाल मुद्गल महाकाल का भक्त है। पहली वाली में श्री कृष्ण रूप लेकर आए ईश्वर ने अपने भक्त की मदद, उसकी जिज्ञासा और प्रश्न से प्रसन्न होकर की थी। जबकि दूसरी वाली में भगवान अपने भक्त के समर्पण और सरलता पर रिझे चले आए।

कहानी की शुरुवात

कहानी शुरू होती है प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ने वाले लड़के विवेक से। साथी लड़कों के चिढ़ाने पर वह हस्तमैथुन और दूसरी चीज करने लगता है । इसका सही ज्ञान न होने के कारण उसकी तबीयत बिगड़ जाती है । अस्पताल में भर्ती होने के बाद उसकी बात पिता को कांतिलाल मुद्गल तक पहुंच जाती है। वह भी सबसे छुपाने की कोशिश करता है लेकिन विवेक का वीडियो वायरल हो जाता है। उसका तमाशा बनाया जाता है । स्कूल से निकाल दिया जाता है। आसपास वालों के ताने और अपमान से इतना दुखी हो जाता है की खुदकुशी करने चला जाता है ।यहां एंट्री होती है महाकाल यानी अक्षय कुमार की । वह विवेक को बचाते हैं और उससे भक्त पिता को सही रास्ता दिखाते हैं। महाकाल मंदिर में फूल की दुकान लगाने वाला और रोज महाकाल के दर्शन करने वाला कांति मुदगल कोर्ट में कैसे लगा देता है। वकील भी खुद ही बनता है। बड़े स्कूल सहित मेडिकल ,डॉक्टर और एक दुकानदार पर मानहानि का केस कर देता है। उनसे माफी मंगवाना चाहता है ताकि उसका बेटा इज्जत से जी सके। कोर्ट में उसका मुकाबला होता है वकील कामिनी मिश्रा यानी यामी गौतम से । सेक्स एजुकेशन दिए जाने और नहीं दिए जाने की कानूनी लड़ाई में दिलचस्प तर्क वितर्क दिए गए है। इस सफर में कांति खुद खूब पड़ता है ।किताबें उदाहरण तर्कों के आधार पर साबित कर देता है की सेक्स एजुकेशन जरूरी है। महाकाल हर मोर्चे पर उसकी मदद करते हैं। सही सेक्स एजुकेशन के अभाव में भ कितने युवा भटक रहे हैं …कितने अपराध बढ़ रहे हैं… कितने बच्चों का शोषण हो रहा है…. सभी के आंकड़े पेश किए गए हैं। आखिरकार फिल्म या साबित करने में कामयाब होती है की सेक्स एजुकेशन और प्राइवेट पार्ट अश्लीलता नहीं है, बल्कि प्राकृतिक है। इनका प्रदर्शन तो नहीं लेकिन इसका ज्ञान होना जरूरी है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक को इसका ज्ञान होना जरूरी है।

एक्टिंग और भावनात्मक पहलू

फिल्म का भावनात्मक पहलू कमाल है। महाकाल की कृपा और उनकी सरलता देखकर कई बार आंखें भीग जाती हैं। कांतिलाल का ठेठपन कई बार हंसी भी दिलाता है। बवाल के कारण फिल्म में उज्जैन और इंदौर का नाम तो नहीं लिया गया है लेकिन बोली और भाषा से दिखाने की कोशिश हुई है की फिल्म महाकाल नगरी में ही बनी है। पंकज को इस बार एक्टिंग में पूरे में नंबर नहीं मिलेंगे। उनका एक नंबर इस बात के लिए काटता है की जो डायलॉग उन्होंने बोले हैं उसका मालवी टच असली नहीं दिखता। अरे उरे… आरिया जरिया नकली सा लगता है ।यामी गौतम हमेशा की तरह खूबसूरत तो है ही एक्टिंग भी शानदार की है। अक्षय कुमार की तारीफ में यही कहा जा सकता है कि जब कृष्ण बने तो कृष्णा लग रहे थे। इस बार महाकाल बने हैं और उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे वाकई धरती पर उतर आए हो। फिल्म के डायलॉग और बेहतर हो सकते थे। सीन हो या किरदार थोड़ी कसावट मुमकिन थी। बहरहाल यह एक जरूरी फिल्म है। मां-बाप को बच्चों के साथ देखना चाहिए और घर जाकर उनसे दोस्त वाली भाषा में बात करना चाहिए। जब मार काट ,नरसंहार और खून खराबे वाली फिल्में परिवार सहित देखी जा सकती हैं तो ओमजी 2 जैसी फिल्म क्यों नहीं ?जो की सही सेक्स एजुकेशन की जरूरत समझ रही है।अगर कुछ अश्लील है तो वो है खून खराबा और मार काट, सेक्स एजुकेशन अश्लील नहीं है।

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